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अंक 47समय3 मिनटपठन 76

प्रकाशक · जीके पुस्तकालय · परिशिष्ट

वीकेंड की सुबह इतनी जल्दी क्यों बीत जाती है?

बस देर तक सोए और एक कप कॉफ़ी पी, इतने में दोपहर हो गई। वे दो घंटे कहाँ गए?

वीकेंड की सुबह एक घड़ी और कॉफ़ी का कप

वीकेंड की सुबह पलक झपकते बीत गई लगती है, तो इसकी वजह घड़ी का तेज़ चलना नहीं है। बीते समय को याद करते हुए हम उसकी अवधि का अंदाज़ा घड़ी से ज़्यादा याद रह गए दृश्यों की संख्या से लगाते हैं। रोज़ के ढर्रे पर आराम से बिताई सुबह में ऐसे दृश्य कम होते हैं, इसलिए दो घंटे भी सिमटकर एक दृश्य जैसे हो जाते हैं।

पीछे मुड़कर देखते समय हम दृश्य गिनते हैं

समय की अवधि महसूस करने के दो तरीके हैं। एक है अभी बीत रहे समय को मापना और दूसरा है बीते समय को याद करके उसकी अवधि का अंदाज़ा लगाना। पीछे मुड़कर देखते समय हम याद रह गई घटनाओं और दृश्य बदलने की संख्या को आधार बनाते हैं। 1969 में मनोवैज्ञानिक ऑर्नस्टीन ने एक प्रयोग की रिपोर्ट दी थी, जिसके अनुसार बराबर अवधि वाले अंतरालों में भी अधिक जानकारी से भरा अंतराल याद में अधिक लंबा लगता है।

कामकाजी दिनों की सुबह उठना, नहाना-धोना, खाना और बाहर निकलना अलग-अलग खानों में बँटे होते हैं, इसलिए याद में कई टुकड़े रह जाते हैं। वीकेंड पर ये खाने हट जाते हैं और लेटने-बैठने के बीच का समय एक ही हिस्से में जुड़ जाता है।

घड़ी पर नज़र न हो तो समय तेज़ी से बीतता है

कामकाजी दिनों में अलार्म और तय मुलाकातें होने पर हम बार-बार देखते हैं कि कितने बजे हैं। समय पर जितना ज़्यादा ध्यान देते हैं, अभी बीत रहा समय उतना ही लंबा लगता है। इसी वजह से जिस बर्तन पर हम नज़र गड़ाए रहते हैं, उसमें पानी जैसे उबलने का नाम ही नहीं लेता।

वीकेंड की सुबह हम घड़ी बहुत कम देखते हैं। इसलिए समय बीतते हुए भी तेज़ लगता है और बाद में याद करने पर भी दृश्य कम होने से छोटा लगता है। यानी दोनों बातें एक साथ असर करती हैं।

जितना जाना-पहचाना, उतना सिमटा हुआ

इज़राइली शोधकर्ताओं ने पाया कि रोज़मर्रा के कामों से भरा समय बाद में याद करने पर अधिक छोटा लगता है। सुकून भरी, जानी-पहचानी वीकेंड की सुबह ठीक ऐसा ही समय है।

लोग कहते हैं, “मज़ा आ रहा हो तो समय जल्दी बीतता है,” लेकिन याद में उसकी अवधि कुछ अलग होती है। किसी अनजान शहर में घूमते हुए यात्रा का पहला दिन बीतते समय भले ही पलक झपकने जैसा लगे, बाद में याद करने पर वह लंबा और भरपूर लगता है। याद में समय छोटा लगेगा या नहीं, इसका संबंध मज़े से ज़्यादा इस बात से है कि उसमें नए दृश्य कितने थे।

बस एक छोटा-सा खाना

अगर आप चाहते हैं कि याद में सुबह लंबी लगे, तो किसी बड़ी योजना के बजाय बस एक छोटा-सा खाना बनाना काफ़ी है। ब्रेड लेने रोज़ से अलग रास्ते पर निकल जाएँ, खिड़की के पास बैठकर ऐसा संगीत चलाएँ जो पहली बार सुन रहे हों या किसी गमले की जगह बदलकर देखें। नया दृश्य बनने पर याद में एक सीमा खिंच जाती है, जिससे पूरी सुबह एक साथ गायब नहीं हो जाती।

आराम से समय बिताना भी अच्छा विश्राम है। सुबह छोटी लगी, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बेकार गई।

वीकेंड की सुबह छोटी लगने की वजह घड़ी नहीं, बल्कि याद रह गए दृश्यों का कम होना है।

टिप्पणियाँ और संदर्भ · ऑर्नस्टीन 1969 · अवनी-बाबाद·रितोव 2003 · ब्लॉक·ज़काय 1997. इस लेख में उन अध्ययनों का संदर्भ लिया गया है जिनके अनुसार याद में जितनी अधिक जानकारी और दृश्यों के बदलाव होते हैं, बीते समय की अवधि का अंदाज़ा उतना ही लंबा लगाया जाता है (ऑर्नस्टीन 1969, मेटा-विश्लेषण ब्लॉक·ज़काय 1997), और उस अध्ययन का भी जिसके अनुसार दोहराव वाले कामों में बिताया समय बाद में याद करने पर अधिक छोटा लगता है (अवनी-बाबाद·रितोव 2003, J. Exp. Psychol. General)।

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छोटी प्रश्नोत्तरी

वीकेंड की सुबह को बाद में याद करने पर वह छोटी क्यों लगती है? सबसे सटीक कारण कौन-सा है?

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