अंक 28मनोविज्ञान3 मिनटपठन 77
प्रकाशक · जीके पुस्तकालय · परिशिष्ट
रिकॉर्डिंग में अपनी आवाज़ सुनकर अजीब लगता है
अपनी आवाज़ तो हम रोज़ सुनते हैं, फिर रिकॉर्डिंग में वह किसी और की आवाज़ जैसी अनजानी क्यों लगती है?
कभी रिकॉर्डिंग चलाने पर अपनी आवाज़ पतली और ऊँची सुनाई देती है, तो हैरानी होती है। दरअसल, बोलते समय हम हवा से आने वाली आवाज़ के साथ खोपड़ी की हड्डियों से पहुँचने वाली गहरी गूँज भी सुनते हैं। रिकॉर्डिंग में वह गूँज मौजूद नहीं होती।
बोलते समय आवाज़ दो रास्तों से सुनते हैं
मुँह से निकली आवाज़ हवा से होकर कान के बाहरी हिस्से में प्रवेश करती है। इसे वायु चालन कहते हैं। उसी समय स्वर तंत्रियों का कंपन खोपड़ी की हड्डियों और जबड़े में कंपन पैदा करता हुआ सीधे कान के भीतरी हिस्से में स्थित कॉक्लिया तक पहुँचता है। इसे अस्थि चालन कहते हैं।
1949 में श्रवण शोधकर्ता फ़ॉन बेकेशी ने एक प्रयोग के नतीजे पेश किए, जिनके अनुसार बोलने वाला व्यक्ति इन दोनों रास्तों से आने वाली आवाज़ लगभग समान तीव्रता से सुनता है। हड्डियों से होकर आने वाली आवाज़ में निचले सुर अच्छी तरह पहुँचते हैं, जबकि मुँह से हवा के रास्ते अपने कान तक पहुँचने वाली आवाज़ में ऊँचे सुर अधिक कमज़ोर पड़ जाते हैं। इसलिए हमें अपनी आवाज़ नीची और भारी लगती है।
रिकॉर्डिंग में सिर्फ़ हवा से आने वाली आवाज़ दर्ज होती है
माइक्रोफ़ोन और सामने वाले व्यक्ति के कान सिर्फ़ हवा में मौजूद आवाज़ ग्रहण करते हैं। खोपड़ी की हड्डियों की गूँज फ़ाइल में दर्ज नहीं होती, इसलिए रिकॉर्डिंग चलाने पर आवाज़ में वे निचले सुर नहीं होते, जिन्हें हम हमेशा सुनते आए हैं।
एक आम ग़लतफ़हमी यह है कि रिकॉर्डर हमारी आवाज़ बदल देता है। छोटा स्पीकर आवाज़ के रंग में थोड़ा बदलाव ज़रूर करता है, लेकिन अच्छे उपकरणों से रिकॉर्ड करने पर भी आवाज़ अनजानी लगती है। रिकॉर्डिंग वाली आवाज़ उस आवाज़ के ज़्यादा करीब होती है, जो दूसरे लोग सुनते आए हैं।
अपनी आवाज़ होने का पता न हो, तो हम उसे बेहतर आँकते हैं
यह हमारी परिचित आवाज़ से मेल नहीं खाती, इसलिए अनजानी लगती है। साथ ही, बोलने का अंदाज़ और आवाज़ का काँपना भी एक साथ सुनाई देता है, जिससे कभी-कभी और झेंप महसूस होती है। आम तौर पर हमारा ध्यान बोलने पर रहता है, इसलिए अपनी आवाज़ को इस तरह इत्मीनान से सुनने का मौक़ा कम ही मिलता है।
2013 में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को कई लोगों की रिकॉर्ड की गई आवाज़ें सुनाईं और उनके आकर्षण का मूल्यांकन करने को कहा। प्रतिभागियों ने उन आवाज़ों में चुपके से शामिल की गई अपनी आवाज़ को दूसरों की आवाज़ों से अधिक अंक दिए। यानी जब हमें पता नहीं होता कि यह अपनी आवाज़ है, तो हम उसका मूल्यांकन कुछ ज़्यादा उदारता से करते हैं। आवाज़ का अनजाना लगना अपने आप में यह नहीं बताता कि वह अच्छी नहीं है।
कान ढककर बोलकर देखें
दोनों हाथों से कान हल्के से ढककर बोलें, तो हड्डियों के ज़रिए सुनाई देने वाली आवाज़ तेज़ हो जाती है। इससे आप महसूस कर सकते हैं कि आम तौर पर अपनी आवाज़ आपको कितनी नीची सुनाई देती है। हाथ हटाकर दोबारा बोलें, तो यह भी सुनाई देता है कि आवाज़ काफ़ी हल्की हो गई है।
प्रस्तुति देने या फ़ोन पर बात करने का अभ्यास करते समय अपनी रिकॉर्ड की गई आवाज़ कुछ बार सुन लेना अच्छा रहता है। दूसरे लोग जो आवाज़ सुनते हैं, उसकी आदत पड़ने पर शुरुआती अनजानापन धीरे-धीरे कम होता है। साथ ही, बोलने की रफ़्तार या उच्चारण जैसी सुधारने योग्य बातें भी बेहतर सुनाई देती हैं।
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रिकॉर्ड की गई आवाज़ उस आवाज़ के करीब होती है, जो दूसरे लोग सुनते हैं। उसमें बस वह गहरी गूँज नहीं होती, जो बोलते समय हमें खोपड़ी की हड्डियों के ज़रिए भी सुनाई देती है।
टिप्पणियाँ और संदर्भ · फ़ॉन बेकेशी 1949, JASA · ह्यूज़ और हैरिसन 2013, Perception. ये एक ऐसे प्रयोग और एक अध्ययन के संदर्भ हैं, जिनमें पाया गया कि बोलने वाला व्यक्ति हवा और हड्डियों से पहुँचने वाली आवाज़ लगभग समान तीव्रता से सुनता है, और अपनी आवाज़ होने का पता न होने पर उसका अधिक उदारता से मूल्यांकन करता है। सिर की बनावट के अनुसार इस अंतर की मात्रा हर व्यक्ति में अलग होती है।
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