अंक 206विज्ञान4 मिनटपठन 122
प्रकाशक · जीके पुस्तकालय · परिशिष्ट
पतले चाँद के पास दिखता धुँधला गोला किसकी रोशनी से चमकता है?
पृथ्वी से परावर्तित सूर्य का प्रकाश चाँद के अँधेरे हिस्से को हल्का-सा रोशन करता है
सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में पतला चाँद दिखे, तो कभी-कभी उसका बाकी अँधेरा हिस्सा भी एक धुँधले गोले के रूप में दिखाई देता है। यह हल्की रोशनी सूर्य का वह प्रकाश है जो पृथ्वी से परावर्तित होकर चाँद तक पहुँचता है और फिर हमारी आँखों तक लौटता है। इसे पृथ्वीप्रभा कहते हैं, यानी पृथ्वी से मिलने वाला प्रकाश।
चाँद से देखें तो पृथ्वी लगभग पूरी गोल दिखाई देती है
जब चाँद पतली कलाओं वाला होता है, तब पृथ्वी से देखने पर वह सूर्य के पास की ओर होता है। हमें चाँद का अधिकतर रात वाला हिस्सा दिखाई देता है, जबकि चाँद से पृथ्वी को देखें तो सूर्य की रोशनी में नहाया उसका दिन वाला हिस्सा लगभग पूरा दिखाई देता है। यानी जब हमें पतला चाँद दिखता है, तब चाँद के आकाश में पूर्णिमा के चाँद जैसी गोल पृथ्वी दिखाई देती है।
चाँद से दिखने वाली पृथ्वी का व्यास, पृथ्वी से दिखने वाले चाँद के व्यास से लगभग 4 गुना बड़ा होता है, और बादल, समुद्र तथा बर्फ सूर्य के प्रकाश को अच्छी तरह परावर्तित करते हैं। इसलिए उस समय चाँद की रात हमारी पूर्णिमा की रात से कहीं अधिक उजली होती है। यह प्रकाश चाँद की सतह पर पड़कर एक बार फिर परावर्तित होता है और पृथ्वी तक लौटता है, जिससे बहुत धुँधला, राख जैसे धूसर रंग का गोला दिखाई देता है।
चाँद पतला हो तो यह रोशनी अच्छी दिखती है
पृथ्वीप्रभा सबसे अच्छी तब दिखाई देती है जब चाँद पतला हो, जैसे अमावस्या के बाद बढ़ता या अमावस्या से पहले घटता चाँद। इसे देखने के लिए सूर्यास्त के बाद एक-दो घंटे पश्चिमी आकाश में, या सूर्योदय से पहले पूर्वी आकाश में देखें। जब चाँद आधे से अधिक भरने लगता है, तब चाँद से दिखने वाली पृथ्वी धीरे-धीरे पतली होती जाती है और उससे मिलने वाला प्रकाश कम हो जाता है। साथ ही चाँद का चमकीला हिस्सा बड़ा होकर आँखों को चकाचौंध करता है, इसलिए उसका धुँधला हिस्सा दब जाता है। हवा जितनी साफ हो और आसपास रोशनी जितनी कम हो, यह उतना ही अच्छा दिखाई देता है।
मोबाइल से तस्वीर लेते समय अगर धुँधले हिस्से के हिसाब से तस्वीर की चमक बढ़ाएँ, तो पतले चमकीले हिस्से की रोशनी सफेद होकर फैल सकती है। इसलिए कभी-कभी तस्वीर की तुलना में नंगी आँखों या दूरबीन से यह अधिक स्पष्ट लगता है।
दा विंची ने सबसे पहले इसकी गुत्थी सुलझाई
इस धुँधली रोशनी की पहली सही व्याख्या करने का श्रेय लियोनार्दो दा विंची को दिया जाता है। 1500 के दशक की शुरुआत में लिखी अपनी नोटबुक, कोडेक्स लेस्टर में उन्होंने लिखा कि पृथ्वी सूर्य का प्रकाश परावर्तित करके चाँद के अँधेरे हिस्से को रोशन करती है। दा विंची का मानना था कि मुख्य रूप से समुद्र प्रकाश लौटाते हैं, लेकिन वास्तव में बादलों की भूमिका अधिक बड़ी होती है।
यह रोशनी आज वैज्ञानिक कामों में भी इस्तेमाल होती है। अमेरिका की बिग बेयर सौर वेधशाला के शोधकर्ता 1990 के दशक के अंत से पृथ्वीप्रभा की चमक मापकर यह गणना करते आए हैं कि पृथ्वी सूर्य का कितना प्रकाश वापस लौटाती है। पृथ्वी के चाँद की ओर वाले हिस्से में जितने अधिक बादल होते हैं, चाँद का अँधेरा हिस्सा भी उतना ही थोड़ा अधिक चमकीला हो जाता है।
पतले चाँद के पास दिखने वाला धुँधला गोला पृथ्वीप्रभा है, जिसमें पृथ्वी से परावर्तित सूर्य का प्रकाश चाँद को रोशन करता है।
टिप्पणियाँ और संदर्भ · दा विंची का कोडेक्स लेस्टर · बिग बेयर सौर वेधशाला के पृथ्वीप्रभा संबंधी प्रेक्षण. दा विंची ने 1500 के दशक की शुरुआत में इसे समुद्र से होने वाले परावर्तन से समझाया था। वास्तव में बादलों से होने वाले परावर्तन की भूमिका बड़ी है, और पृथ्वीप्रभा की चमक पृथ्वी के चाँद की ओर वाले हिस्से में बादलों की मात्रा के अनुसार बदलती है (1990 के दशक के अंत से प्रेक्षण किए जा रहे हैं)।
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